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पाश्चात्य दार्शनिक चिंतन एवं हिंदी साहित्य

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Course TypeCourse CodeNo. Of Credits
Foundation CoreNA6
  • Does the course connect to, build on or overlap with any other courses offered in AUD?
  • इस पाठ्यक्रम का सम्बन्ध हिंदी साहित्य पर पड़ने वाले विभिन्न पाश्चात्य सिद्धांतों के प्रभाव से है | साथ ही इसका सम्बन्ध बी.ए में और एम् ए हिंदी में पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रम से भी है |
  • Specific requirements on the part of students who can be admitted to this course: (Pre- requisites; prior knowledge level; any others – please specify) None
  • No. of students to be admitted (with justification if lower than usual cohort size is proposed):As per School Rule
  • Course scheduling (semester; semester-long/half-semester course; workshop mode; seminar mode; any other – please specify):

1st Semester(GEC)

  • How does the course link with the vision of AUD?
  • दर्शन का सम्बन्ध मनुष्य के जीवन और उसके मूल्यों से जुडा होता है | यह पाठ्यक्रम हिंदी विशेष से इतर विद्यार्थियों के लिए है | इसलिए पाश्चात्य साहित्य और दर्शन के माध्यम से हिंदी साहित्य से भी रु-ब-रु हो सकते हैं | इस पाठ्यक्रम का उद्देश्य मनोविश्लेषणवाद,अस्तित्वाद सरंचनावाद आदि के बारे में समझ विकसित करना है जिसका सम्बन्ध मानव मन पर पड़ने वाले प्रभाव से भी है | विचारों और भावनाओ का सामंजस्य इस कोर्स में देखा जा सकता है यही सामंजस्य इसे अम्बेडकर विश्वविद्यालय के विजन से जोड़ता है |
  • How does the course link with the specific programme(s) where it is being offered?
  • इस पाठ्यक्रम का सम्बन्ध विभिन्न स्नातक स्तर पर पढाए जाने वाले विषय जैसे अंग्रेजी,मनोविज्ञान ,राजनीति विज्ञान से है जहाँ ये सारे पाश्चात्य चिंतन किसी न किसी रूप में दिखाई पड़ते है | इसलिए हिंदी साहित्य से इतर विद्यार्थियों के लिए यह पाठ्यक्रम उपयोगी है |

Course Details:

Summary:

विश्व युद्ध के बाद बहुत बाद बहुत सी विचार धाराएँ अस्तित्व में आई जिनका प्रभाव मनुष्य जीवन पर पड़ा साथ ही जिनका अक्स साहित्य में भी देखा गया | सार्त्र,कामू काफ्का जैसे विचारको ने आस्तित्ववाद के प्रति समझ विकसित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया |“सार्त्र ने अपने व्यक्तिगत अनुभव से इस विचारधारा को विकसित किया विभिन्न प्रतिरोध आंदोलनों में हिस्सा लेने की वजह से भोगी हुई अनुभूतियों की प्रखर स्वीकृति है | इसके साथ ही जिंदगी के प्रति मोह भी दिखाई पड़ता है |इस असंगति भरे विश्व से एक अद्भुत निर्मम खिचाव भी | “मिथ ऑफ़ सिसीफस” ने पाठको के सम्मुख एक ऐसे जगत का उदघाटन किया जो अपरिचित होते हुए भी आज के मनुष्य के लिए खूब जाना पहचाना है |” अभिव्यज्नावाद ,अस्स्तित्वाद से लेकर मनोविश्लेषण वाद ,मार्क्सवाद आधुनिकतावाद,सरंचनावाद आदि सभी पाश्चात्य विचारो का विश्व पर क्या प्रभाव पड़ता है इसे समझने का प्रयास रहेगा | साथ ही साहित्य में विभिन्न वाद-विवाद की प्रक्रिया रही है ,इनको आलोचनात्मक तरीके से समझने की कोशिश रहेगी | साहित्य की विभिन्न विधाओं में अभिव्यज्नावाद,मार्क्सवाद ,आधुनिकतावाद, आदि के तत्व कितने मौजूद रहे ,उनके बीच जो बहसे पनपी उन्हें भी देखने का प्रयास रहेगा |

यदि हम हिंदी साहित्य को देखें तो उसमें पाते है ,यह सारे पाश्चात्य चिंतन वहां भी किसी न किसी रूप में दिखाई पड़ते है | इन पाश्चात्य विचारो ,दर्शन आदि का प्रभाव हिंदी साहित्य पर भी पड़ा है | इन पाश्चात्य विचारो को हिंदी आलोचना में स्थान मिलता है वहां फिर क्रोचे के अभिव्यंजनावाद की तुलना वक्रोक्ति से की जाने लगती है | स्वछंदतावाद को हिंदी के छायावाद में खोजने की कोशिश होती है फिर आगे की प्रक्रिया मे मार्क्सवाद का नाम हिंदी में प्रगतिवाद के नाम से जाना जाने लगा बिम्ब,फंटेसी ,कल्पना मिथक प्रतीक हिंदी साहित्य को समझने के मुख्य बिंदु प्रतीत होने लगते है |

Objectives:

इस पाठ्यक्रम के अध्ययन से विद्यार्थी पाश्चात्य आलोचना और हिंदी आलोचना की तुलना कर दोनों के अन्तर के प्रति अपनी समझ विकसित कर सकते हैं | साथ ही कला के वास्तविक अर्थो की खोज अभिव्यंजनावाद के जरिए समझने की प्रक्रिया से गुजरेंगे | किस प्रकार क्रोचे कला के लिए आंतरिक अभिव्यक्ति को महत्त्व देते है ,ज्यां पाल सात्र,अल्बेयर कामू,अस्तित्ववाद की महत्ता स्थापित करते है ,इसी तरह कार्ल मार्क्स पूंजीवाद के दुष्प्रभावों की चर्चा करते है | इन सभी विषयों से रु-ब-रु होकर इनकी वैचारिकी की समझ ,इन्हें जीवन में उतारने की प्रक्रिया से भी गुजरेंगे |

Expected learning outcomes:

  • विद्यार्थी को पाश्चात्य दर्शन से परिचित करना ।
  • विभिन्न सिद्धांतों,वादो और विचारो जैसे मनोविश्लेषणवाद,मार्क्सवाद, आधुनिकतावाद आदि के माध्यम से जीवन और साहित्य के प्रति समझ विकसित करना ।
  • इन वादो से पड़ने वाले प्रभावों से अवगत करना आदि ।
  • आलोचनात्मक समझ विकसित करना |

Overall structure (course organisation, rationale of organisation; outline of each module):

माड्यूल-1 पाश्चात्य दर्शन का परिचय और उसके उपकरण (कल्पना,फंटैसी बिम्ब , प्रतीक ,मिथक, )

कालरिज की व्याख्या अनुसार कल्पना वह शक्ति है जो अंतर्जगत और बाह्यजगत का सफल संयोजन करती है और प्रतिबोधन और अवबोधन के अंतर को मिटाती है जिसे बुद्धि के सहारे नही मिटाया जा सकता | कल्पना वस्तुओ और पदार्थो में चेतना का संचार करती है और उसे जीवन रूप में हमारे समुख पेश करती है | इसी प्रकार कल्पना और फेंटेसी को लेकर भी विभिन्न पाश्चात्य विचार दिखाई पड़ते है इस तरह इस माड्यूल में पश्चिमी विचारको और भारतीय विचारको के दृष्टिकोण के माध्यम से हिंदी साहित्य को समझने का प्रयास होगा |बिम्ब ,प्रतीक और मिथकों की चर्चा भी इसी माड्यूल में की जाएगी

माड्यूल-2- अभिव्यंजनवाद और स्वछंदतावाद

अभिव्यंजनावाद का प्रवर्तक बेनेदेत्तो क्रोचे है ,जिनका उद्देश्य साहित्य में आत्मा की अन्तः सत्ता स्थापित करना था | इससे पूर्व कांट ने मन तथा बाहय जगत के तादात्मय और समन्वय का प्रतिपादन करते हुए दृश्य जगत की उपेक्षा की और हीगेल ने कांट की मान्यता स्वीकार करते हुए दृश्य जगत को महत्त्व दिया | जबकि क्रोचे ने केवल मानसिक प्रक्रिया को ही महत्त्व दिया

| क्रोचे ने अभिव्यज्नावाद कला के मूल तत्व की खोज का प्रयास है | कला की आत्मा क्या है इस पर क्रोचे अपने विचार रखते हुए स्पष्ट करते है उनके समस्त सौन्दर्य विवेचन में आत्म तत्व विद्यमान है |इसी आत्म तत्व को क्रोचे ने आतंरिक अभिव्यक्ति कहा है |

इस माड्यूल में क्रोचे के अभिव्यंजनावादको समझा जायेगा ,जहाँ वो मानसिक कोटियों की बात करते हैं –मानसिक और व्यावहारिक ..| किस प्रकार क्रोचे कला को सहजानुभूति मानते है ,उसकी पूरी प्रक्रिया क्या है इस सब पर विस्तार से चर्चा की जाएगी | क्रोचे के अभिव्यंजनावाद और वक्रोक्ति सिद्धांत के तुलनात्मक पक्षो पर भी बात की जाएगी | आचार्य शुक्ल अभिव्यंजनावाद को “भारतीय वक्रोक्तिवाद का विलायती उथान कहते है ,इन सभी बिन्दुओ को आधार बनाकर इस विषय से अवगत कराया जायेगा |

स्वछंदतावाद को आधुनिक युग की देन माना गया है ,जिसकी प्रवतियाँ प्रत्येक समय में किसी न किसी रूप में विद्यमान रही है | अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में रूसों ने मानवीय स्वछंदतावाद का समर्थन किया | उन्होंने एक और प्रकृति की सहजता एवम रम्यता का प्रतिपादन किया ,वहीँ दूसरी और मानवीय स्वतंत्रता का भी समर्थन किया | रूसो के इन विचारो का परवर्ती विचारको पर गहरा प्रभाव दिखाई पड़ता है | 1800 में वर्डस्वर्थ ने लिरिकल बैलेड्स के दूसरे संस्करण में स्वछंदतावाद की स्थापना की इसलिए इसे स्वछंदतावाद का घोषणा पत्र माना गया |

स्वछंदतावाद की विचारधारा पुरानी मान्यताओ के स्थान पर नये मूल्यों को स्थापित करने की विचारधारा है | इस विचारधारा का लेखक समाज में चले आ रहे पुराने हो चुके विचारों ,मान्यताओं के ख़िलाफ़ विद्रोही स्वर को तवज्जो,तरजीह देता है | इस विचारधारा के रचनाकारों के बारे में आलोचकों का मानना है कि –“वह रचना के संदर्भ में बाह्य नियमों की अपेक्षा कवि के व्यक्तित्व को प्रधान मानता है | काव्य प्रयोजनों के रूप में नैतिकता के विरुद्ध आनंद की प्रतिष्ठा करता है ,बंधे बंधाये छंदों को नकार कर लय और गति पर आधारित छंदों की सर्जना पर बल देता है ...संस्कृतनिष्ठ भाषा के स्थान पर जन भाषा के प्रयोग पर बल देता है |” स्वछंदतावादी रचनाकार समाज और यथार्थ के प्रति विद्रोह करता है | कार्य और बौद्धिकता के विरुद्ध मनोवेगों की स्थापना करता है | अपनी इस विचारधारा के कारण रचनाकारों को आलोचना का भी शिकार होना पड़ा बावजूद इसके इस विचारधारा को साहित्य में स्थान दिया गया |

माड्यूल- 3 आधुनिकतावाद ,मनोविश्लेषणवाद ,अस्तित्ववाद

मनोविश्लेषण वाद के प्रवर्तक फ्रायड अपने समय और सामाजिक सभ्यता से असंतुष्ट होकर मानव मूल्यों के समक्ष प्रश्नचिन्ह लगाते है | वास्तव में मनुष्य काम –प्रवत्ति के हाथो की कटपुतली मात्र है | इसी क्रिया में मन के विभिन्न भागो-चेतन और अवचेतन और इनके बीच तीसरा भाग भी है जो चेतन से कुछ पहले का है इसे पूर्व चेतन नाम दिया है | फ्रायड ने कल्पना को महत्त्व दिया कवि –कल्पना को दिवा-स्वप्न मानते है | इस माड्यूल में फ्रायड के दृष्टिकोण को आधार बनाकर साहित्य की रचना प्रक्रिया , कला चिंतन के मूल स्रोत को समझने का प्रयास रहेगा |

इसी माड्यूल में आधुनिकतावाद के सिद्धांत का भी अध्ययन किया जायेगा |

अस्तित्ववाद का उदय उन्नसवी शताब्दी के मध्य से माना जाता है इसकी पृष्ठभूमि में औद्योगिक क्रन्तिजनित वह भौतिकता थी जो मनुष्य अस्तित्व की अवहेलना कर रही थी | जबकि अस्तित्ववाद की अवधारणा “मानव अस्तित्व “ का महत्वपूर्ण स्थान है || सारें किर्केगाद इसके प्रवर्तक माने जाते है किन्तु मुख्य स्थान सार्त्र का है | इस माड्यूल में नीत्से,हेडगर,सार्त्र,कामू के अस्तिताव्वाद को लेकर जो विचार है उन्हें समझा जाएगा |

माड्यूल-4 मार्क्सवाद ,सरंचनावाद

इस माड्यूल में कार्ल मार्क्स के काव्यशास्त्रीय चिंतन ,दृष्टिकोण पर बात की जाएगी | “दास केपिटल”.में जिस द्वंदात्मक भौतिकवाद की चर्चा है उसके मूल में समाजवाद है ,जो वर्ग-संघर्ष की बात करता है | कला और साहित्य के क्षेत्र में यह प्रगतिवाद के नाम से जाना जाता है |मार्क्स ने सर्वहारा वर्ग की स्थिति और उसके वर्ग -संघर्ष के उद्देश्य में साहित्य के उद्देश्य पर विचार किया है | साहित्य के इसी उद्देश्य पर विचार करते हुए मार्क्स लिखते है –

  • बुर्जुआ संस्कृति की वास्तविकता की छानबीन करना और उसकी कमजोरियों का चित्रण करना |
  • समाज के सम्पूर्ण जीवन के साथ बुर्जुआ जीवन पद्धति की असंगतिऔर जीवन पद्धति का बाधक स्वरुप का उद्घाटन करना
  • सामाजिक संबंधों की समग्रता के बीच सर्वहारा के जीवन संघर्ष का चित्रण करना आदि |

इस तरह इस माड्यूल में यह देखने का प्रयास रहेगा कि मार्क्स किस प्रकार कला और साहित्य के उन सब प्रतिमानों का तीव्र विरोध करते है जो सर्वहारा वर्ग के हितो की रक्षा नहीं करते ,जो सर्वहारा वर्ग की उन्नति में बाधक है| मार्क्सवाद का विश्व साहित्य पर जो प्रभाव पड़ा उन सब बिन्दुओ पर चर्चा की जाएगी |सरंचनावाद के सिद्धांत को भी इस माड्यूल में पढ़ा जायेगा |

सहायक पाठ:

  • पाश्चात्य काव्यशास्त्र ,डॉ तारकनाथ बाली,वाणी प्रकाशन,नई दिल्ली
  • काव्य चिंतन की पश्चिमी परम्परा ,डॉ निर्मला जैन,वाणी प्रकाशन,नई दिल्ली 1990
  • उत्तर आधुनिकता :कुछ विचार देवीशंकर नवीन (स०)वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली ,
  • उत्तर आधुनिकतावाद,जगदीश्वर चतुर्वेदी ,स्वराज प्रकाशन ,नई दिल्ली ,2004
  • उत्तर आधुनिकता :बहुआयामी सन्दर्भ-पांडेय शशि भूषण शीतांशु,वाणी प्रकाशन,नई दिल्ली ,2010
  • पाश्चात्य काव्यशास्त्र : अधुनातन सन्दर्भ,डॉ सत्यदेव मिश्र,लोकभारती प्रकाशन,इलाहाबाद
  • आधुनिक हिंदी आलोचना के बीज शब्द, बच्चन सिंह, वाणी प्रकाशन, दिल्ली,
  • आधुनिक परिवेश और अस्तित्ववाद डॉ शिवप्रसाद सिंह 1988
  • पाश्चात्य साहित्य चिंतन ,डॉ करुणाशंकर उपाध्याय,राधाकृष्ण प्रकाशन ,2016
  • हिंदी साहित्य कोश, सम्पादक धीरेंद्र वर्मा, ज्ञानमंडल, वाराणसी,
  • आधुनिक परिवेश और अस्तित्ववाद,डा,शिव प्रसाद सिंह,नेशनल पब्लिशिंग हॉउस,1998
  • सोफी का संसार ,सत्यपाल सहगल(अनुवादित ) राजकमल प्रकाशन
  • पाश्चात्य काव्यशास्त्र,देवेन्द्र नाथ शर्मा
  • पाश्चात्य काव्यशास्त्र,कृष्णदेव शर्मा,विनोद पुस्तक ,आगरा
  • भारतीय व पाश्चात्य काव्यशास्त्र तथा हिंदी आलोचना ,रामचंद्र तिवारी
  • पाश्चात्य काव्यशास्त्र इतिहास सिद्धांत और वाद ,भागीरथ मिश्र

Contents (week wise plan with readings):

Week

Plan/ Theme/ Topic

Objectives

Core Reading (with no. of pages)

Additional Suggested Readings

Assessment (weights, modes, scheduling)

1

पाश्चात्य काव्यशास्त्र के बारे में चर्चा

 

विभिन्न सिद्धांत जिनका प्रभाव भारतीय साहित्य पर पड़ा

काव्य चिंतन की पश्चिमी परम्परा ,डॉ निर्मला जैन

पाश्चात्य काव्यशास्त्र ,डॉ तारकनाथ

 

2

कल्पना ,फंटेंसी का स्वरुप

 

 

 

हिंदी साहित्य की काव्य विधा में आए कल्पना और फेंटेसी के रूप की  चर्चा

 

 

आधुनिक हिंदी आलोचना के बीज शब्द, बच्चन सिंह

 

गृह कार्य -20%

3

बिम्ब अवधारणा

 

हिंदी साहित्य के काव्य में आए बिम्ब ,उदाहरण के माध्यम से स्पष्टीकरण

 

 

आधुनिक संवेदना का विकास-राम स्वरुप चतुर्वेदी

 

 

 

4

प्रतीक और मिथकों की अवधारणा

हिंदी साहित्य की काव्य विधा के माध्यम से चर्चा

 

 

 

 

 

 

 

 

 

5

अभिव्यज्नावाद

 

अभिव्य्ज्नावाद की सम्पूर्ण व्याख्या और वक्रोक्ति के साथ तुलना के बिन्दुओ पर चर्चा 

पाश्चात्य काव्यशास्त्र,कृष्णदेव शर्मा,विनोद पुस्तक ,आगरा

 

 

 

6

स्वछंदतावाद (भारतीय और पाश्चात्य सन्दर्भ)

 

 

 

 

छायावाद में आई एक प्रवृति के रूप में अध्ययन

 

 

भारतीय व पाश्चात्य काव्यशास्त्र तथा हिंदी आलोचना ,रामचंद्र तिवारी

 

 

30% कक्षा-प्रस्तुति

7

अस्तित्ववाद

 

 

 

विभिन्न पाश्चात्य विचारको के दृष्टिकोण का तुलनामक अध्ययन

आधुनिक परिवेश और अस्तित्ववाद डॉ शिवप्रसाद सिंह

 

30%  गृह-कार्य

8

मनोविश्लेषणवाद की सैद्धांतिक पृष्भूमि

 

 

 

साहित्य को आधार बनाकर मनोविश्लेषण के सिद्धांत को समझने का प्रयास

 

 

 

9

आधुनिकतावाद के उथान पर चर्चा

 

 

आधुनिकतावाद की विचारधारा के विकसित होने के पीछे कारकों का अध्ययन

उत्तर आधुनिकता :बहुआयामी सन्दर्भ-पांडेय शशि भूषण शीतांशु, उत्तर आधुनिकतावाद,जगदीश्वर चतुर्वेदी

 

 

10

मार्क्सवाद का  सिद्धांत- हिंदी साहित्य के ,

की व्याख्या

मार्क्सवाद की व्याख्याप्रगतिवाद के रूप वर्ग-संघर्षमें

 

 

 

11

द्वंदात्मक भौतिकवाद

द्वंदात्मक भौतिकवाद के स्वरुप को समझने का प्रयास

 

 

 

12

सरंचनावाद

भाषा शास्त्र के विशेष सन्दर्भ में

 

 

20% सत्रांत परीक्षा

Pedagogy:

  • Instructional strategies: कक्षा अध्यापन, विशिष्ट व्याख्यान और फिल्म/डाक्यूमेंटरी आदि ई-संसाधनों का प्रयोग
  • Special needs (facilities, requirements in terms of software, studio, lab, clinic, library,classroom/others instructional space; any other – please specify):None
  • Expertise in AUD faculty or outside AUD faculty
  • Linkages with external agencies (e.g., with field-based organizations, hospital; any others) None

Note-

  • Modifications on the basis of deliberations in the Board of Studies (or Research Studies Committee in the case of research programmes) and the relevant Standing Committee (SCAP/SCPVCE/SCR) shall be incorporated and the revised proposal should be submitted to the Academic Council with due recommendations.
  • Core courses which are meant to be part of more than one programme, and are to be shared across Schools, may need to be taken through the Boards of Studies of the respective Schools. The electives shared between more than one programme should have been approved in the Board of Studies of and taken through the SCAP/SCPVCE/SCR of the primary School.
  • In certain special cases, where a course does not belong to any particular School, the proposal may be submitted through SCAP/SCPVCE/SCR to the Academic Council.